Saturday, 30 March 2019

प्यार का मेथमेटिक्स



ये बहुत अजीब लेकिन सच बात है कि ख़ुद से प्यार में पड़ने से पहले हमें कई ऐसे लोगों से प्यार करना पड़ता है, जो हमें उतना प्यार नहीं करते जितना हम उन्हें करते हैं, या फिर हमारी क़द्र नहीं करते!
ख़ुद से प्यार कर पाने की मंज़िल तक पहुँचने का रास्ता हमेशा कुछ नाकामियों से होकर गुज़रता है! ऐसा इसलिए है क्योंकि एक इंसान होने के नाते बचपन से हमें सिखाया जाता है, दूसरे इंसानों से, जानवरों से, पेड़-पौधों से प्यार करना! ख़ुद से प्यार करना कोई नहीं सिखाता, वो हमें ज़िंदग़ी ही सिखाती है!
बचपन में जब हम परीकथाएँ पढ़ते हैं और जवानी में जब हम रूमानी फ़िल्में देखते हैं, तो सोचने लगते हैं कि हमारी ज़िंदग़ी भी ऐसी हो तो क्या मज़ा हो! और हम निकल पड़ते हैं, अपनी ज़िंदग़ी वैसी बनाने को! हम प्यार करते हैं! कॉलेज लाइफ मे आकर अपनी सारी सीमाएँ तोड़ते हैं! उस इंसान की उंगली पकड़कर सारी दुनिया देख जाना चाहते हैं! उसकी नज़र से ज़िंदग़ी देखना हमें अच्छा लगता है! हम ये भूल जाते हैं कि वो इंसान भी अपने सफ़र में है! वो भी अपने लिए एक परीकथा, एक शानदार प्रेमकहानी बनाने की कोशिश कर रहा है! जब हम उसके सामने वो बन जाते हैं, जो हम नहीं हैं, तो ज़ाहिर तौर पर हम अपना बेहतरीन उसे नहीं दे पाते! और फिर हम उसके लिए बेस्ट नहीं रहते और वो इंसान अपने लिए नया रास्ता तलाश करने लगता है!
हम फिर प्यार करते हैं! इस बार हम ठानकर बैठे होते हैं कि ऐसा कुछ नहीं करेंगे, जो हमारे व्यक्तित्व से मेल नहीं खाता! हम उस इंसान को अपना वो हिस्सा देते हैं, जो आजतक अपने किसी क़रीबी को न दिया हो! हम अपनी आत्मा खोलकर उसके सामने रख देते हैं! वो इस बात को समझता है कि हम कितने मासूम और नाज़ुक हैं! वो हमारी कमज़ोरियों को समझता है और एक इंसान होने के नाते जाने-अनजाने में उनका फ़ायदा भी उठा जाता है! हम इस इश्क़ में मिला दर्द सहते हैं, सहते जाते हैं क्योंकि हमें लगता है कि दर्द से बनने वाली प्रेमकथा ही शायद सबसे अच्छी प्रेमकथा होती है! जब दर्द सीमा से बाहर हो जाता है, तो हम फट पड़ते हैं! इस बार हम तय करते हैं, अब किसी को मौका नहीं देना ख़ुद को दुःख पहुँचाने का! हम अब अकेले अपना सफ़र तय करना चाहते हैं!
हम फिर से प्यार करते हैं! इस बार वाला प्यार बहुत सतर्क होकर किया जाता है! अब तक हम ख़ुद को जान चुके होते हैं और लोगों को भी! हम जानते हैं कि हम भावनात्मक रूप से कितने कमज़ोर हो सकते हैं और दूसरा इंसान किस हद तक हमारा फ़ायदा उठा सकता है, हमारी भावनाओं को ठेस पहुँचा सकता है! हम डरकर प्यार करते हैं, हम ख़ुद को सुरक्षित रखने के लिए ज़रूरत से ज़्यादा प्रयास करते हैं और यहाँ हमें एहसास होता है कि हम दूसरों से प्यार करने की ताक़त कहीं खो चुके हैं! वो इंसान हमें पसंद है, हम उसे बाकी लोगों से दो दर्जे ऊपर चढ़ाकर उससे व्यवहार करते हैं! वो इंसान भी अपना सफ़र तय करके आया है, उसने भी राह के लगभग वो सभी पत्थर देखे हैं, जो हमने देखे हैं! हो सकता है, वो हमसे कहीं आगे हो! हम भी ख़ुद को बचाए रखने के लिए अपना सौ प्रतिशत उसे नहीं देना चाहते, इसलिए उसे भी कभी पूरी तरह ये एहसास नहीं हो पाता कि वो हमारे लिए क्या है! वो उस लिहाज़ से हमारी क़द्र नहीं कर पाता और ये प्रेमकहानी शुरू होने से पहले ही ख़त्म हो जाती है!
इस सब के बाद हमें अपनी एहमियत का एहसास होता है! हमें अब पता चलता है कि हमारी परीकथा कहीं हमारे अंदर ही मौजूद है! हम ही अपनी प्रेमकहानी कहानी के हीरो और हीरोइन हैं! हम ही अपने आप को समझेंगे! हम ही ख़ुद को ख़ास महसूस कराएँगे। हम ही अपना जीवनभर साथ निभाएँगे! क्योंकि दूसरों से उम्मीदें लगाकर और निराशा पाकर हम देख चुके हैं! अब ख़ुद से उम्मीदें लगाते हैं, ख़ुद को सशक्त करते हैं, ख़ुद को एहमियत देते हैं और अंत में ख़ुद से प्यार कर जाते हैं!

हम, 21वीँ सदी और ये रिश्ते

इस आर्टिकल को पढ़ने से पहले आपको दो वादा करना पड़ेगा.....
1. ख़ुद को ख़ुश रखने के लिए, या  अपनी मानसिक शांति बनाए रखने के लिए आप हमेशा वो लम्हा याद करेंगे जब आप बेहद खुश थे!
2. आज से आप खुद को कभी धोखा नही देंगे, खुद से कभी झूठ नही बोलेंगे!


चलिए चल पड़ते हैं जिन्दगी के सफर मे,
निकल पड़ते हैं हम एक जिन्दा लाश की तरह...!

हम लोग अक्सर ये बातें करते हैं कि मेरी उसकी नही बनती, हम दोनों के सोच मे जमीं आसमाँ का अंतर है! लेकिन क्या होगा अगर ये जिन्दगी मे सबकुछ परफेक्ट हो जाए, मतलब जो हम सोचे वही हो, तो ब्रदर जीने का मजा ही बिखर जायेगा! ये जिन्दगी बोरिंग सी हो जाएगी! ठीक वैसे जैसे आपके पसंदीदा रसगुल्ला को आप रोज हर समय खा रहे हैं!  ये जो दरारें व कमियां होती हैं ना, वाकई यही हमारी जिन्दगी की खूबसूरती है! यही हमारे जीने की वजह है, यही हमे बेहतर ख्वाब दिखलाती है!
इसलिए कभी कभी अगर फालतू की नौटंकी भी हो जाए तो नाराज नही होते! ऐसे ही कुछ दरारों को भरने के लिए हमारी ज़िंदग़ी मे कुछ रिश्ते बिना प्रयास के अपने आप बन जाते हैं! ऐसे रिश्तों से हम खुद ब खुद एक जुड़ाव सा महसूस करते हैं! ऐसे रिश्तों को बयान नहीं किया जा सकता, बस उनकी गर्माहट महसूस की जा सकती है! अगर कभी इनको परिभाषित करने की कोशिश भी की जाती है, तो हम ख़ुद को ही शर्मिंदा कर जाते हैं!
हम ऐसे लोगों से मिलकर सुकून महसूस करने लगते हैं, खुलकर मुस्कुराना चाहते हैं, अपने दिल की हर बात कह जाते हैं! ये रिश्ता किसी से भी हो सकता है, किसी दोस्त से, माँ-बाप से, भाई-बहन से, या फिर किसी अजनबी से भी!
कभी-कभी, हर रिश्ते की तरह ये रिश्ता भी एकतरफ़ा होता है! सिर्फ़ आपके दिलोदिमाग़ में बनाया हुआ! इसमें सुकून सिर्फ़ आपको महसूस होता है, क़रीबी सिर्फ़ आप महसूस कर पाते हैं, ये रिश्ता ख़ास भी सिर्फ़ आपको लगता है और कभी-कभी कोई इस तरह के रिश्ते को स्वीकार नहीं करना चाहता! अनजाने में या जानबूझकर! ख़ुद से डरकर, अपने बीते हुए कल से डरकर, अपनी भावनाओं से डरकर!
इस तरह के रिश्तों की बस यही ख़ूबसूरती होती है कि यहाँ सब कुछ अपने आप होता है, सब कुछ सहज होता है, बिना किसी प्रयास, बिना किसी उम्मीद, बिना किसी नाराज़गी व बिना किसी कशिश के!
ऐसे ही रिश्तों को जीवित रखने मे सबसे ज्यादा सहयोग होता है, भरोसा का, विश्वास का!
जब आप किसी अजनबी या अपने पर भरोसा करते हैं, तो उसे अपने व्यक्तित्व का एक हिस्सा दे देते हैं! मतलब अपने जिन्दगी को उस रिश्ते में निवेश कर जाते हैं, उसमें और ख़ुद में कोई फ़र्क़ नही करते हैं! भरोसा करने का मतलब होता है, ये मानना कि किसी भी परिस्थिति में आप उनके लिए जो करेंगे, वो भी आपके लिए ठीक वैसा ही करेंगे!
वक़्त के साथ रिश्ता चाहे आगे बढ़े या वहीं छूट जाए, आपका वो हिस्सा उस इंसान में हमेशा रह जाता है!
चाहे वो इंसान आपका भरोसा तोड़ भी दे, आप उस रिश्ते को अपने प्यार से पोषित करना छोड़ भी दें, लेकिन आपका वो हिस्सा हमेशा उसके अंदर रहता है! उसे ये एहसास दिलाता है कि आपने उस रिश्ते में अपने आपको कितना निवेश किया था! उसे ये याद दिलाता है कि आपके लिए वो इंसान कितनी अहमियत रखता था!
बस इसी वजह से कुछ रिश्ते कभी ख़त्म नहीं होते, दो लोगों के बीच पनपा वो भरोसा कहीं न कहीं हमेशा ज़िंदा रहता है! आपका वो हिस्सा हमेशा ज़िंदा रहता है! वो चाहे जितना भुलाने का प्रयास करे उसके अवचेतन मन मे वो व्यक्तित्व हमेशा के लिए सुरक्षित हो जाता है!
जीवन के इस सफर मे हमे कभी न कभी असफलता का भी मुँह देखना पड़ता है! मनोविज्ञान मे एक सिद्धांत है जिसको अंग्रेजी मे कहते हैं, "Frustration Aggression Theory". जिसके अनुसार असफल व अवसाद की स्थिति मे हम आक्रामक हो जाते हैं और हम अपने आगे सबकुछ नगण्य समझने लगते हैं और "Ego defense mechanism - Displacement" के अनुसार हम असफलता की जिम्मेदारी दूसरों पर मढ़ देते हैं जबकि हम यह जानते हैं कि पूरे जिम्मेदार हम हैं!
दुनिया में सबसे आसान काम होता है, दूसरों पर किसी चीज़ का दोष मढ़ना! ऐसा करने पर न तो ख़ुद को बुरा महसूस होता है और न ही पश्चाताप की भावना दिल को सताती है! कितना अच्छा महसूस होता होगा तब जब कुछ भी बुरा होने का ज़िम्मेदार किसी को ठहराया जा सके और उसे अपने बारे में बुरा महसूस कराया जा सके!
अब आते हैं, सबसे मुश्किल चीज़ पर! वो है, ज़िम्मेदारी उठाना! अपनी गलतियों को स्वीकार करना और उनसे होने वाले नुकसान की भरपाई करके आने वाले कल को बेहतर बनाना! ये ख़ुद को बुरा महसूस कराने के लिए नहीं, बल्कि वक़्त के साथ अपने व्यक्तित्व में सुधार के लिए होता है!
ऐसा करने के लिए बहुत हिम्मत चाहिए होती है और सब्र भी! ऐसा करने के लिए ख़ुद पर भरोसा होना चाहिए और एक अच्छा इंसान बनने की मंशा भी!

कहते हैं कि कुछ ज़ख़्म कभी नहीं भरते! मुझे लगता है कि कुछ ज़ख़्म ऐसे होते हैं, जिनका दर्द हम ज़िंदग़ी भर सहना चाहते हैं! ऐसे ज़ख़्मों को हम ठीक उसी तरह संजोकर रखना चाहते हैं, जिस तरह हम उस इंसान की यादों को संजोकर रखते हैं, जिसने हमें वो दर्द दिया है!
ये सच है कि कुछ चीज़ों से उभरना मुश्क़िल होता है, लेकिन कभी-कभी हम उभरने की कोशिश तक नहीं करते और अपनी ज़िंदग़ी को कोसते जाते हैं और कभी-कभी बस उस ज़ख़्म को सहने की आदत को छोड़ नहीं पाते!
ज़िंदग़ी में कुछ इंसानों को अहमियत देना अच्छा है और ज़रूरी भी, लेकिन ये समझना भी ज़रूरी है कि हर इंसान का हमारी ज़िंदग़ी में एक हिस्सा होता है! जिसके हिस्से में ज़्यादा वक़्त आया, वो ज़्यादा देर तक ठहरता है, और जिसके हिस्से में कम आया, वो वक़्त देखकर निकल जाता है!
हाँ, ज़िंदग़ी आसान नहीं है और हमारे रिश्ते भी कम उलझन भरे नहीं है, लेकिन उन्हें सुलझाने का काम हमारा ही है और ज़िंदग़ी को आसान बनाने का भी!
ये हमारी मानसिक शांति के लिए ज़रूरी है और हमारी फ़िक़्र करने वाले लोगों के लिए भी!

जिंदगी विविधताओं से भरी पड़ी है! अत: ज़िंदग़ी से शिकायत सबको होनी चाहिए! मुझे इसमें कुछ ग़लत नज़र नहीं आता, जिससे हम प्यार करते हैं, नाराज़गी भी तो उसी से हो पाती है और फिर, हर चीज़ की तरह ज़िंदग़ी की भी अपनी ख़ामियाँ और ख़ूबियाँ हैं!
ख़ामियों की बात करें, तो हर चीज़ और हर इंसान की तरह ये भी कभी न कभी आपको छोड़कर चली जाती है! इसका सिखाने का अंदाज़ थोड़ा सा जुदा है! ये आपको कड़वे अनुभव देती है और उनसे आपको मज़बूत रहना सिखाती है! ये गाहे-बगाहे आपसे नाराज़ भी हो जाती है और अगर आप इसकी क़द्र नहीं करते, तो ये भी आपकी क़द्र करना छोड़ देती है!
ख़ूबियों में सबसे प्यारी बात ये है कि ये हमें हमारे वजूद का एहसास कराती है! हमारा अस्तित्व क्या है इसका आभास कराती रहती हैं! वक़्त-वक़्त पर हमें बताती रहती है कि आपके लिए अपने आपसे ज़रूरी और कुछ नहीं होना चाहिए! ये हमें लोगों से मिलाती है, उनसे रिश्ते बनाना, प्यार करना सिखाती है! ये हमें सिखाती है कि जो भी हो जाए हमें बस अपना काम करते रहना है, जैसे ये बेनागा चलती रहती है, बेफ़िक्र सी!
तो कभी-कभी ज़िंदग़ी से नाराज़ होना ठीक है! नाराज़ तो हम ख़ुद से भी हो जाते हैं! ज़रूरी बात ये है कि ज़िंदग़ी के लिए और अपने आप के लिए प्यार बरकरार रहे! तभी ज़िंदग़ी आपकी क़द्र करेगी और आप ख़ुद अपने आप की भी प्यार कर सकेंगे!
करीब हर इंसान किसी भी बात को अपने नज़रिये से देखना पसंद करता है! हर इंसान को यही लगता है कि किसी भी चीज़ के बारे में जो वो सोच रहा है, वो ही ठीक है! ऐसा इसलिए है क्योंकि हम किसी भी और से ज़्यादा अपने आप पर, अपनी सोच पर विश्वास करते हैं!
ख़ुद पर विश्वास होना अच्छा है, लेकिन ऐसा करते हुए दूसरे व्यक्ति की सोच को ही नकार देना अजीब है! ख़ुद को ऊपर रखते-रखते और दूसरे को ग़लत साबित करते-करते हम ये एहसास ही नहीं कर पाते कि किस तरह धीरे-धीरे हम अपने सबसे क़रीबी लोगों को दूर कर देते हैं! शायद हमारे अंदर अहम की भावना आ रही होती है!
जब हम किसी से पहली बार मिलते हैं, तो उसके बारे में सब कुछ जान लेना चाहते हैं और उसकी सोच को तवज्जो देते हैं! ये सब शायद हम उसके व्यक्तित्व को खोलने के लिए और उसके क़रीब आने के लिए करते हैं!
मज़े की बात ये है कि जब वो व्यक्ति हमें अपना क़रीबी महसूस करके हमें दिल से अपनी बात कहना शुरू करता है, तो हम उसकी सोच को, उसके व्यक्तित्व को तवज्जो देना कम कर देते हैं! अब हमें ये डर लगने लगता है कि हमारे व्यक्तित्व में हमसे ज़्यादा उसका व्यक्तित्व न भारी हो जाए और हम उसे नकारना शुरू कर देते हैं और इग्नोर मारते है!
धीरे-धीरे हम फिर से अजनबियों से हो जाते हैं और ये प्रक्रिया बार-बार और अमूमन दोहराई जाती है। इसे रोकने का कोई तरीका मैं आज तक समझ नहीं पाया हूँ! अपने मम्मी पापा से बात किया व कई सारी किताबें पढ़ी और आज मनोविज्ञान पढ़ रहा हूँ लेकिन मुझे इसका जवाब नही मिला! अपने व्यक्तित्व को बचाने के फेर में हम दूसरों के व्यक्तित्व से खेल जाते हैं और अफ़सोस की बात ये है कि इसे ग़लत भी नहीं ठहराया जा सकता!
आख़िर, अपने आप को बचाने का हक़ तो हर इंसान को है!

हम जीवन मे कितने भी बड़े हो जाएँ, लेकिन अपने क़रीबी लोगों से ठीक उसी तरह रूठ जाते हैं, जैसे बचपन में अपने माता-पिता से रूठ जाते थे और मनचाही चीज़ मिल जाने पर उसी तरह खिलखिलाते हैं, जैसे बचपन में खिलखिलाते थे!
हम जितने मर्ज़ी बड़े हो जाएँ, लेकिन सपने देखना नहीं छोड़ते! ख़ुद को आगे और बेहतर देखने की ख़्वाहिश ख़त्म नहीं होती! बस हाँ, सपने बदल जाते हैं और ख़्वाहिशें बदल जाती हैं!
तो ज़रूरत बस इतनी है कि अपने अंदर छिपे इस बच्चे को पहचाना जाए और उसे खुलकर बाहर आने की आज़ादी दी जाए! ऐसा करने से जो ख़ुशी मिलेगी, वो शायद दुनिया की और कोई चीज़ नहीं दे पाएगी!


©Rahul_Pal

Saturday, 19 January 2019

हॉस्टल लाइफ और वो रूममेट

मुद्दतों बाद जब तुम अपने बच्चे को स्नातक की पढ़ाई के लिए किसी विश्वविद्यालय भेजोगे तो उस समय आपके घर मे बीबी बच्चों के अलावा कोई नहीं होगा! आपका वो छात्रावास वाला रूममेट नही होगा जो सुबह सुबह जोर जोर से बोलबोलकर तुम्हारी नींद को डिस्टर्ब करता है, कभी कभी समाचारपत्र को जोर जोर से पढ़ने लगता है !  जो चुपके से तुम्हारा परफ्यूम लगाकर क्लॉस के लिए निकल जाता है! अरे भोपड़ी के तुम्हारी ही बात कर रहा हूँ, अबे हरामखोर तुम भूल गए ना मुझे!
अरे हम वही हैं जो अपने अपने घर से सैकड़ों किमी दूर रहकर एक दूसरे का गार्जियन की तरह ख्याल रखते थे, इतना ज्यादा ख्याल रखते थे कि माई बाबू की कभी याद ही नहीं आती है! 
दो बजे वाली क्लॉस करने को बाद आता था तो बस एक ही सवाल पूछता है, "भाई, खाना खाया कि नहीं?" लेकिन भाई तो दगाबाज निकल जाता है और बोलता है, "हाँ, मैने खा लिया! तुम भी जल्दी बचाखुचा खा लो वरना मेस बन्द हो जायेगा! "
"यार हम लोग खाना खाने के बाद लाइट बन्द करके बिन्दास सोएंगे! उसके बाद पढ़ना है!"
"हाँ बे, मै भी बहुत थक गया हूँ!"
लाइट के लिए, दोस्तों के रूम पर आने के लिए और तो कभी कभी मोदी जी को लेकर थोड़ी बहुत नोकझोंक व विवाद तो रूममेट का धर्म है! रविवार के दिन कपड़े धोने के लिए रूममेट से हाथ पैर जोड़कर मिन्नतें करना, लेकिन रूममेट जैसा कठोर दिल वाला कोई नही है! क्योकि परफ्यूम का असर भी खतम हो गया है तो फिर मन ना होते हुए भी कपड़ा तो धोना ही पड़ेगा! रातों रातों घंटो घंटो अपनी कन्यामित्र से बतियाकर पार्टनर को जलाने का सुख बहुत खतरनाक होता है!
कभी कभी बहुत रात को वापस आने पर ये केवल रूममेट ही पूछ सकता है, "कहाँ थे बे अभी तक? कहीँ किसी लड़की वड़की का तो चक्कर नहीं? "
"नहीं यार लाइब्रेरी मे था, वो पीले सूट वाली लड़की जो थी, आज बहुत स्माइल दे रही थी, कसम से देखना कुछ दिनो मे पटा लूँगा! "
कुछ कही अनकही न जाने कितनी मुहब्बत की दास्तान जो केवल रूममेट तक की सीमित रह जाती थी, आगे नहीं बढ़ पाती है!
रात के 1 बज चुके होते हैं और सबलोग अपने अपने कामों मे मशगूल रहते हैं! ऐसा सन्नाटा कि सबकी दिल की आवाज भी साफ साफ सुनी जा रही थी! तभी तो मैने अचानक बोला "चलो बाहर चलते हैं चाय पीने!" "अबे तुमने तो मेरे दिल की बात कह दी!"
चाहे जितनी भी काली रात हो, सर्द भरी रात हो, लेकिन  हॉस्टलों मे रहकर अगर रात मे बाहर की चाय नही पी तो खाक होस्टल मे रहे हैं! घर के सदस्यों से भी बढ़कर हमेशा दिलदार बनकर ख्याल रखने वाला ये रूममेट और कभी कभी तो इतना ख्याल रखता है कि बाथरूम मे कितने देर तक था, ये भी याद रहता है! कभी कभी सरदर्द का बहाना लेकर गर्ल्स हॉस्टल के चक्कर व वीटी पर चाय पीने जाना, हेल्थ सेंटर जाकर अपना वेट चेक करना व कभी कभी भौकाल मारते हुए अपने नंबर बढ़ाचढ़ाकर बताना इन सब मे बहुत कुछ सीखने को मिलता है!
इतने सारे दोस्त जिनका कोई ठिकाना नही, लेकिन सेमेस्टर क्लियर करने की कला, कम पैसे मे रेस्त्रां जाने की कला, गर्लफ्रेंड बनाने की टिप्स, किसी को मारने की प्लान और सबसे बढ़कर तो जब बर्थडे वाला दिन आता है तो जीपीएल करने का सबसे ढांसू गुप्त प्लान इसी रूममेट का रहता है! ऐसे लगता है कि सारे विलक्षण प्रतिभा की धनी हमारी मित्रमण्डली ही है! थ्री इडियट मूवी देखो तो लगता है कि रैंछोड़दास ने ऐक्टिंग हमी से ही सीखी होगी!

तब ये पल, ये अल्हड़पन, ये विशाल हरा भरा परिसर, ये बनारस का स्वाद कोसो दूर हो जायेगा, बस रह जायेंगी तो सिर्फ कुछ यादें और शायद कुछ फोटोग्राफ्स भी, शायद फोन नंबर भी न रहे! फेसबुक बाबा तो कब का छूट जायेंगे, नई नई जिम्मेवारियां जो इसकी जगह ले लेगी! तब इन पलों को, अपने दूसरे गार्जियन यानी रूममेट को याद करके केवल गम व बिछुड़न के दो आँसू टपका देना!

Thursday, 17 January 2019

प्रेम सँवेदना





जब मै तुम्हें देखती हूं तो लगता है कि सौंदर्य की परिभाषा तुम्हारे लिए ही बनी है! वैसे तो तुम्हारे शब्दों मे तुम्हारी सादगी को मैने पढ ली थी!
मगर तुम्हें देखा तो लगा, तुम पूर्ण रूपेण सादे हो,पूरी  बने ही नहीं हो! इतना साधारण  मैंने पहले कभी नहीं देखा था!
क्लास के अंदर जब आपको पहली बार देखी थी तो मै कई बार दौड़ कर बाथरूम गई  और मुँह धोकर, अपना बाल सही करके शीशा देखी और तुम्हें यह भी बता दूँ- "मेरे सारे बाल इतने काले नहीं हैं!  कुछ सफेद बाल हैं इनमें! कल ही कलर लगाया है!" अचानक ख़याल आया, क्यों मै इतना घबरा रही हूँ, उम्र के साथ आई चेहरे की झुर्रियों को क्यों छुपा रही हूँ ? और स्वत: चेहरा मुस्कुराहट से भर गया!
मेरे प्रेमिका बनने की चाह चली गई, तुम्हें देखकर! इतना ही नहीं, मैं एक पत्नी हूँ, यह भी भूल गई थी, जैसे ही तुमने मुझे देखा! एक ऐसा भी नज़र था वह, जिसने मुझे देखकर भी नहीं देखा। मुझे लगा मैं बस एक स्त्री हूँ, और एक पूरी स्त्री बनती चली गई वहीं तुम्हारे सामने! निस्संकोच!
तुम हो कि आते ही बोले, "कबीर की छवि को हम कभी किसी तुलनात्मक दृष्टि से नहीं देखते हैं। यही है कबीर का निर्गुण!" मैं खड़ी की खड़ी रह गई भूल ही गई थी, मैं कौन हूँ! आते ही सीधी वही बात, जो करनी है, और कुछ भी नहीं। बच्चे करते हैं ऐसे तो,
फिर तो बातों में रात कर दी तुमने! घर जाना है, भूल गये! मैंने कहा आज यहीं रुक जाओ! तुमने तो औपचारिकता के लिए भी मना नहीं किया! वो घर पर नहीं हैं, और बच्चे दोनों होस्टल में रहते हैं, यह तो मुझे पता था न! तुमने तो ना कोई सवाल किया, ना संकोच जताया! जैसे मैंने कह दिया तो बस रुकना ही है!
खाना खाया तो, इतना भी नहीं कहा कि खाना अच्छा है! मैं कोई शिकायत नहीं कर रही हूँ! याद आया तो कह रही हूँ!
और रात को आकर मेरे बिस्तर पर ही लेट गये, मेरे साथ! मुझे लगा था कि तुम मुझे छुओगे, तुरन्त नहीं तो थोड़ी देर बातें करके, और तुम्हारे स्पर्श को मैं स्वीकार कर लूँगी, तुरन्त नहीं तो एक दो बार तुम्हारा हाथ हटा कर! क्योंकि यही अर्थ होता है, एक ही बिस्तर पर एक स्त्री और एक पुरुष के होने का, सोने का! प्रेमी-प्रेमिका हो जाना! पर तुम तो कबीर से चलकर उस अंधेरे में चले गए जहाँ से हम यहाँ आये हैं, उस ईशाणु तक पहुँच गये जिससे हम बने हैं! सुनते सुनते मेरी आँख लग गई!
मुझे तब का पता है जब तुम उठ कर गये, और ड्राईंग रूम में सोफे पर जा कर सो गये! प्रेमिका प्रेमी से जब लिपट कर सोती है तो सोने का उपक्रम करती है! पर स्त्री जब स्वयं से ही लिपट कर सोती है, तो सोती है! यह केवल तुम जान सकते हो!
प्रेम अधूरा होने का एहसास है! पिपासा है! मैं अब तृप्त हो चुकी हूँ, तुमसे मिलने के बाद!
चले गये हो तो भी क्या है! लो आओ, बिना तुम्हें छूए ही तुम्हें अपने वक्ष से लगा लेती हूँ, मेरे कल्पना-पुरुष!
अब मैं एक पूरी प्रेमिका हो गई हूँ!

तुम्हारी पूर्व और पूर्ण प्रेमिका! 😍

Friday, 21 December 2018

क्रश की परिभाषा

LTC मे उसके पीछे बैठने का ख्वाब लिए,
तुम अपनी अटेंडेस भी 90% कर लेते हो!
एक घण्टे मे बोर हो जाने वाली क्लॉस,
अब एक्स्ट्रा क्लॉस का इंतजार कर लेते हो!
तुम कभी लाइब्रेरी के दर्शन नही किए थे,
अब बेशकीमती साइबर मे सीट उसको देते हो!
हमेशा उसको दिखाने के लिए तुम अब,
अंग्रेजी वाली मैगजीन पढ़ने लग जाते हो!
"भाई, मेरे ऊपर कौन सा शर्ट देगा?"
अपने रूममेट से यही सवाल पूछते रहते हो!
अपने बैकबेंचर्स के दोस्तों को छोड़कर,
अब फ्रंटबेंचर्स का चोला ओढ़ लेते हो!
प्रीवियस ईयर के पेपर्स और नोट्स,
उसके बिना माँगे भेजते रहते हो!
"मै उसको ये बात जरूर बोलूँगा,"
हर समय यही सब विचार करते रहते हो!
जब वह सामने आ जाती है तो,
नजर इधर उधर घुमाने लगते हो!
एक कपड़े से पूरा सप्ताह निकालते थे,
इत्र व जेल से लैस अब रोज वस्त्र  बदलते हो!
पहले दोस्तों संग ढाबा पर चाय पीते थे,
कैफे पर चॉकलेट शेक व कोल्ड कॉफी लेते हो!
फेसबुक के लाइक व्हाट्सअप के स्टेटस मे,
बड़ी शिद्दत से उसकी तलाश करते रहते हो!
कही वों डिस्टर्ब न हो जाए यार,
इसी डर से Hi, Hello का मैसेज नही करते हो!
व्हाट्सएप स्टेटस का स्क्रीनशॉट रखते हो,
लेकिन उसको रिप्लाई करने मे डरते हो!
उसी का ख्याल लिए जेहन मे,
अब गुमसुम से तुम रहने लगे हो!

दोस्त, शायद तुम भी अब प्यार करने लगे हो!

बेतुके बयान की दास्तां

बालीवुड के लेजेंड एक्टर नसीरुद्दीन शाह जी ने अभी एक बयान दिया था, उनके बयान को मै धर्म की नजर से नहीं देखता हूँ। उनके मन मे भविष्य के लिए जो विचार आया उसको व्यक्त कर दिया, अब हम इसी बयान के आधार पर उनको ट्रॉल करे, उनको पाकिस्तान व सीरिया जाने को बोलें या उनको धमकियाँ दे तो ये एक तरह से उनके बयान को सही साबित करने का हम मौका दे रहे हैं। यही तो वो कह रहा है हमे उनके बयान को गलत साबित करना था, लेकिन हम क्या कर रहे हैं?

दूसरी बात यह है कि हमे इन सब बातों को ज्यादा महत्व देना ही नहीं चाहिए वरना इसका राजनीतिकरण बहुत जल्दी हो जाता है। इसको धर्म व साम्प्रदायिकता से जोड़कर हम महत्वपूर्ण मुद्दों से जानबूझकर भटक जाते हैं और हमारे हाथ मे कुछ नही आता। ऐसे बयानों से हमारी भावनायें बहुत जल्दी आहत हो जाती है लेकिन वास्तविक मुद्दों और सच्चाई से हम कभी आहत नहीं होते, कितनी शर्म की बात है ना!

अक्सर हमे हमारे अधिकार पता होते हैं लेकिन हमारे फर्ज क्या हैं और हमारे कर्तव्य क्या हैं ये हमे नहीं पता होता।

हम कहाँ जा रहे हैं? हमारा लक्ष्य क्या है? वास्तव मे हमे शिक्षा की नही जागरूकता की जरूरत है क्योंकि जागरूकता ही हमे चिंतित बना सकती है और चिंता से ही हम सही और गलत मे अन्तर जान सकते हैं। हमे चिंता करना होगी कि हमारा कौन सा कदम आगे चलकर हमारी आने वाली पीढ़ी  के लिए खतरा बन सकता है, समाज मे कभी कभी कुछ चीजें, जो नही होना चाहिए, हो जाती हैं, जिसको हमे रोकने का प्रयास करना चाहिए। वरना हम मानव और पशु मे कोई अंतर नहीं। यदि हम रोकने का प्रयास नही करेंगे तो आगे चलकर यही सब हमे डराएगा और शायद हम अपनी अन्तरआत्मा और अग्रिम पीढ़ी को मुँह दिखाने के काबिल भी ना हो पाएँ।

©राहुल

Wednesday, 14 November 2018

सेमेस्टर के सीजन मे बीएचयू का रंग

बीएचयू मे अगर आपको संस्कार देखने है तो सेमेस्टर एग्जाम के जमाने मे परिसर मे कभी पैर रखिये....
पहला अटैक होता है सेन्ट्रल लाइब्रेरी मे, जहाँ पर दुनिया भर की मूल्यवान किताबों की अद्भुत खान रखी है! आपको सारी किताबें मिल जायेंगी लेकिन शायद ही रेफ्रेंस किताबें मिले! रात 9 बजे तक जब तक आपको लाइब्रेरी से भगाया नही जाता आप नही भागते! सर्दी की काली रातों मे आपकी साइकिल व बाइक ओस व कुहासे से एकदम गीली हो जाती है! ठण्ड मे भी लाइब्रेरी के बाहर के मैदान पर जी-20 का शिखर सम्मेलन चल रहा होता है!
दूसरा नजारा लाइब्रेरी से आगे कुछ कदम बढ़ाने पर वीटी दिखता है शराफत व ज्ञान की ऐसी गंगा बहती है कि माँ सरस्वती भी देख के शर्मा जाये! कल जो लड़के वीटी पर भाभियों को ताड़ते थे आज वही लड़के "श्रॉडिंगर वेव इक्वेशन" को चाटते फिर रहे हैं! पीछे से कॉमर्स फैकल्टी की खूबसूरत सी लंबी सी माशूका जा रही है लेकिन मजाल है कि उसके बार मे कुछ सोचे क्योंकि दिमाक मे जो "प्लेट टेक्टोनिक थ्योरी" जो खिसक रही है!
इधर हॉस्टल मे सबकी हवा टाइट! अरे माई हो, इतना सन्नाटा! कैंपस की हरियाली देखकर मन खुश ही नही हो रहा है, इतने सारे पेड़ इनका क्लॉसीफिकेशन! धत्त तेरी की इतनी फैमिली कौन याद करेगा बे! रात मे जिनका प्रेम अपनी गर्लसखी से घण्टो बतियाने मे जगता है आज वे दुबे जी से सिलेबस भिजवाने के लिए नाक रगड़ रहे है! गूगल पर "एनिमल डायवर्सिटी" खोज रहे है, गूगल बाबा हैरान! अरे ई कहाँ से सूरज पश्छिम से निकल आवा!
जो लोग अस्सी घाट पर जाकर अपनी माशूका के गोरे गालों पर अपने काले होंठो को रखकर प्यार की अनुभूति जगाते है उनके काले होंठ आज स्ट्रक्चरल जिओलॉजी के स्ट्रक्चर रटते रटते लाल हो जाते है! बॉलीवुड मे मेकअप आर्टिस्ट भी ऐसी नेचुरली लाल नही कर पाते होंगे!
मेस मे महाराज जी कुछ भी बनाए, पूड़ी हो या सत्तू हो व भिंडी के सब्जी मे भी आलू हो, कोई फर्क नही पड़ रहा! महाराज जी भी प्यार से खिलाते है अचानक दाल मे लाल मिर्च मिलती है, मिर्च का रंग लाल मतलब लाइकोपिन! लाइकोपिन का स्ट्रक्चर? दिमाग के होश गुम!
रात के बारह बजे सूसू करने के लिए उठते है तो मच्छर भिनभिना रहा है, पता चला कि वो "साइमन्ड फ्रॉड की साइकोएनाल्सिस थ्योरी" सुना रहा है! नित्य क्रियाकर्म करके वापस रूम मे आने पर पता चला कि अभी जो युरिया निकाल के आ रहा हूँ वो तो लैब मे बना सबसे पहला कार्बनिक पदार्थ है!
धन्य हो सेमेस्टर सिस्टम!
तुम जब आती हो तो बच्चों को कल्लो सी उनकी मिस वर्ड को भी भुला देती हो!
यही है यहाँ का एग्जाम सीजन!
सभी को ऑल द बेस्ट और फेसबुक की प्रोफाइल पिक की तरह मुस्कुराते रहिए! बहुत ज्यादा पढ़ने वालों के लिए श्री कलाम जी द्वारा एक संदेश, "कुछ समय गपशप मे भी दीजिए, क्लासें बंक करना भी सीखिये, मेरी प्रॉक्सी भी मारिए, क्योंकि एडल्टहूड मे यही सब याद आयेगा, नंबर व ग्रेड नहीं!"
©राहुल