हमारा भारतवर्ष एक लोकतांत्रिक देश है, मतलब की यहां की जनता अपने प्रतिनिधियों को चुनती है. हमारे समाज की सबसे बड़ी कमजोरी यहां की जाति व्यवस्था है. क्योंकि अगर समाज में जाती रहेगी तो उसका असर हमारे दैनिक जीवन पर जरुर देखेगा उसको कोई रोक नहीं सकता है और हमारे यहां के राजनेता भी इसी व्यवस्था का लाभ उठाते हैं और उनको हमेशा जाति व्यवस्था में फसाए रहना चाहते हैं. इस सत्य को हमें कड़वे घूंट के रूप में पी लेना होगा कि जाति व्यवस्था को इस समाज से खत्म करना ही होगा क्योंकि इससे कभी फायदा नहीं हुआ है हमेशा इससे समाज में दरार ही पैदा हुई है.
इतिहास इस बात का साक्षी है, अभी हाल ही में हरियाणा में जाट आंदोलन, राजस्थान में गुर्जर, गुजरात में पटेल आंदोलन, राजस्थान में पद्मावती के विरोध में राजपूत लोगों का पूरे देश में विरोध, कर्नाटक में लिंगायत लोगो का विरोध.
आज के आंदोलन से केवल राजनेताओं को ही फायदा हुआ है इससे समाज में बंटवारा बहुत बढ़ गया है.
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 मैं यह उल्लेख किया गया है कि
"धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर विभेद का प्रतिषेध"
कब तक यह भेदभाव चलता रहेगा,
कब तक यह जातिवाद जातिगत दंगे होते रहेंगे,
कब तक नेता लोग अपना उल्लू सीधा करने के लिए जाति का सहारा लेंगे
और कब तक यह वोटों की राजनीति जाति से तय होगी
हमारे यहां जाति व्यवस्था जाति का कीड़ा बहुत अंदर तक घुस चुका है उसको खत्म करना ही होगा नहीं तो पूरे देश को खोखला कर देगा. अगर हमारे देश में जाति व्यवस्था को ही खत्म कर दिया जाए तो सारी समस्याएं हल हो जाएगी, कोई जाति नहीं रहेगी ना ही कोई जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल करेगा. केवल धर्म रहेगा और उसी धर्म में हम लोग रहेंगे, क्योंकि जब तक जाती रहेगी तब तक सामाजिक सद्भावना लाना नामुमकिन है.
Monday, 8 January 2018
हमारे देश में जाति व्यवस्था
Wednesday, 3 January 2018
Tuesday, 2 January 2018
कल तेरे शहर से
कल तेरे शहर से क्या गुजरा
मुझे तुम्हारी बहुत याद आई
धुंध में डूबे शहरों की
सूनसान गलियां
बंद किवाड़ वाले दरवाज़े
और घरों की छतों पर
गीला कपड़ो के सिवाय कुछ नहीं
दुपहरी की छुपी छुपा धूप
हर बार तेरी याद दिलाते रहे
धान के खेत की ये हरियाली
मानो तेरे इंतजार मे हो
एक अजीब सा सन्नाटा
पसरा है मेरे गाँव मे
मैं अपना गाँव छोडकर आया
तेरे बनारस शहर मे
तेरे से कब मेरा हो गया
पता ही नही चला
याद है वो पल
अस्सीघाट की सीढ़ियो
पर जब हम तुम बैठे थे
एक खंडहर का
गुंबद था मेरे सामने
गंगा जी बह रही थी खंडहर के बाजू से
हमेशा की तरह ख़ामोश थे तुम
रेंगती हुई नाव मानो
दुखों का एक सिलसिला थी
और तुम चले गये
शाम बुझ रही थी और
लौटना की कोई आहट नहीं थी कहीं....
Thursday, 28 December 2017
हमारी न्यायवस्वस्था
गीता की कसम,
हाथों में तराजू
आँखो मे पट्टी बांधी है.
लक्ष्मी जी की इज्जत है
चंद घोटालेबाजों के हाथों में
ये न्यायवस्वस्था की कैसी आंधी है
अगर इसी तरह होते रहे फैसले
तो कोई न्यायालय नही जायेगा
गरीब जनता की होगी चीख
न्यायपालिका से भरोसा उठ जायेगा
सब खुद ही आपस मे फैसला कर लेंगे
खुद ही आपस मे सजा दे देंगे
रामराज्य से जंगलराज आ जायेगा
चंद पैसे और माननीयों को छोड़ो
न्याय की देवी की आँखो मे आंसू तो देखो
करते वक्त अपनी कलम से फैसला
माँ भारती की आन बान व शान तो देखो
वंदे मातरम
हाथों में तराजू
आँखो मे पट्टी बांधी है.
लक्ष्मी जी की इज्जत है
चंद घोटालेबाजों के हाथों में
ये न्यायवस्वस्था की कैसी आंधी है
अगर इसी तरह होते रहे फैसले
तो कोई न्यायालय नही जायेगा
गरीब जनता की होगी चीख
न्यायपालिका से भरोसा उठ जायेगा
सब खुद ही आपस मे फैसला कर लेंगे
खुद ही आपस मे सजा दे देंगे
रामराज्य से जंगलराज आ जायेगा
चंद पैसे और माननीयों को छोड़ो
न्याय की देवी की आँखो मे आंसू तो देखो
करते वक्त अपनी कलम से फैसला
माँ भारती की आन बान व शान तो देखो
वंदे मातरम
वह चश्मे वाली लड़की
वह चश्मे वाली लड़की थी
जो मेरे साथ पढ़ती थी
चुपके चुपके हौले हौले
मुझको देखा करती थी
खामोश लफ्ज थे मेरे
वह बकबक बोला करती थी
गंगा की पवित्रता थी उसमें
और मिश्री जैसी मीठी थी
धीमे धीमे खामोशी से
जब वह बातें करती थी
रिमझिम जैसी बातों में से
एक ग़ज़ल निकला करती थी
तनहाई में गुनगुनाता हूं वो गजल
जब वह याद आती थी
उदास होना तो मेरा नसीब है
वही सफर वहीं मंजिल थी
क्या लिखूं अब उसके बारे में
यौवन की वो एक ज्वाला
मेरे प्रेम की एक प्याला थी
वह चश्मे वाली लड़की थी
जो मेरे साथ पढ़ती थी...
जो मेरे साथ पढ़ती थी
चुपके चुपके हौले हौले
मुझको देखा करती थी
खामोश लफ्ज थे मेरे
वह बकबक बोला करती थी
गंगा की पवित्रता थी उसमें
और मिश्री जैसी मीठी थी
धीमे धीमे खामोशी से
जब वह बातें करती थी
रिमझिम जैसी बातों में से
एक ग़ज़ल निकला करती थी
तनहाई में गुनगुनाता हूं वो गजल
जब वह याद आती थी
उदास होना तो मेरा नसीब है
वही सफर वहीं मंजिल थी
क्या लिखूं अब उसके बारे में
यौवन की वो एक ज्वाला
मेरे प्रेम की एक प्याला थी
वह चश्मे वाली लड़की थी
जो मेरे साथ पढ़ती थी...
Friday, 3 November 2017
प्रेम
कौन जान सकेगा कि
पा गया मै कितना कुछ
उन चंद लम्हों में
जब तुम बैठी थी मेरे पास
और मै......
एक टक निहार रहा था तुझे
शायद मै ढूंढ रहा था
तुझमे अपनी "प्रियतमा"
पर मेरे चेहरे की लकीरों में
तुम्हारी उदास आँखें
भटक रही थी..
और मैं .......
उन चंद लम्हों को समेट लेना चाहता था....
सदियों की मेरी प्यास आज
भींग रही थी
बूंद बूंद एहसास में
तुम्हारे मिलन के
चंद लम्हों के पल को
अपने दिल मे सोख लेना चाहता था....
अपना प्रेम .....
पा गया मै कितना कुछ
उन चंद लम्हों में
जब तुम बैठी थी मेरे पास
और मै......
एक टक निहार रहा था तुझे
शायद मै ढूंढ रहा था
तुझमे अपनी "प्रियतमा"
पर मेरे चेहरे की लकीरों में
तुम्हारी उदास आँखें
भटक रही थी..
और मैं .......
उन चंद लम्हों को समेट लेना चाहता था....
सदियों की मेरी प्यास आज
भींग रही थी
बूंद बूंद एहसास में
तुम्हारे मिलन के
चंद लम्हों के पल को
अपने दिल मे सोख लेना चाहता था....
अपना प्रेम .....
Tuesday, 17 October 2017
दलाली
"सर, रेप केस आया है।"मुंशी ने कहा।
"आहा..."दारोगा के चेहरे पर चमक आ गई।
"दुष्कर्मी मालदार आदमी है। उसका पैरवीकार भी आ गया सर।"
"मूँछ पर ताव देकर,"बोहनी अच्छी है। लाख -डेढ़ लाख असानी से मिल ही जाएगा।"
"पीड़िता स्कूली ड्रेस पहने हुए अर्धमूर्छित अवस्था में है। कुछ बोल नहीं रही है सर।"
"हूं......सामने लाओ उसे।"
उसे देख दरोगा जी की चीख निकल गई।"कमीने छोड़ूगा नहीं। मुंशी जी जोरदार धारा लगाओ। साला बेल होने न पाए।"
"सर,तीन लाख तक देगा।"
"आँखें तरेरते हुए,"दलाली तो बंद करो।"
"सहमते हुए,"क्या हुआ सर!"
"पीड़िता मेरी बेटी है।"
"आश्चर्य से,"क्या....."
सम्हलते हुए,"आपके पूर्व निर्देशानुशार अनाम लड़की के नाम हलकी एफ.आई.आर.लिखी जा चुकी है। कॉपी जिला एस.पी.को ऑनलाइन भेजी जा चुकी है।"
जोरदार चीख के साथ टेबल पर सिर पटकते हुए,"साले हम लोग निर्दयी राक्षस हैं।"और फुटकर रोने लगा।"
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